महाभारत 5.113.9
नातः परं वैनतेय किंचित्पापिष्ठमुच्यतेयथाशानाशनं लोके देहि नास्तीति वा वचः
nātaḥ paraṃ vainateya kiṃcitpāpiṣṭhamucyateyathāśānāśanaṃ loke dehi nāstīti vā vacaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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