महाभारत 5.134.7
यद्येतत्संविजानासि यदि सम्यग्ब्रवीम्यहम्कृत्वासौम्यमिवात्मानं जयायोत्तिष्ठ संजय
yadyetatsaṃvijānāsi yadi samyagbravīmyahamkṛtvāsaumyamivātmānaṃ jayāyottiṣṭha saṃjaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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