महाभारत 5.143.5
कुण्डली बद्धकवचो देवगर्भः श्रिया वृतःजातस्त्वमसि दुर्धर्ष मया पुत्र पितुर्गृहे
kuṇḍalī baddhakavaco devagarbhaḥ śriyā vṛtaḥjātastvamasi durdharṣa mayā putra piturgṛhe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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