महाभारत 5.161.2
पदातिनीं नागवतीं रथिनीमश्ववृन्दिनीम्चतुर्विधबलां भीमामकम्प्यां पृथिवीमिव
padātinīṃ nāgavatīṃ rathinīmaśvavṛndinīmcaturvidhabalāṃ bhīmāmakampyāṃ pṛthivīmiva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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