महाभारत 5.79.6
जानासि हि यथा दृष्ट्वा चीराजिनधरान्वनेतवापि मन्युरुद्भूतो दुःखितान्प्रेक्ष्य पाण्डवान्
jānāsi hi yathā dṛṣṭvā cīrājinadharānvanetavāpi manyurudbhūto duḥkhitānprekṣya pāṇḍavān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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