महाभारत 6.10.2
यत्र गृद्धाः पाण्डुसुता यत्र मे सज्जते मनःएतन्मे तत्त्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि संजय
yatra gṛddhāḥ pāṇḍusutā yatra me sajjate manaḥetanme tattvamācakṣva kuśalo hyasi saṃjaya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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