महाभारत 6.102.70
माधवस्तु वचः श्रुत्वा फल्गुनस्य महात्मनःनकिंचिदुक्त्वा सक्रोध आरुरोह रथं पुनः
mādhavastu vacaḥ śrutvā phalgunasya mahātmanaḥnakiṃciduktvā sakrodha āruroha rathaṃ punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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