महाभारत 6.13.43
सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दनविष्कम्भेण ततो राजन्मण्डलं त्रिंशतं समम्
sūryastvaṣṭau sahasrāṇi dve cānye kurunandanaviṣkambheṇa tato rājanmaṇḍalaṃ triṃśataṃ samam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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