महाभारत 6.2.22
ज्वलितार्केन्दुनक्षत्रं निर्विशेषदिनक्षपम्अहोरात्रं मया दृष्टं तत्क्षयाय भविष्यति
jvalitārkendunakṣatraṃ nirviśeṣadinakṣapamahorātraṃ mayā dṛṣṭaṃ tatkṣayāya bhaviṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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