महाभारत 6.31.16अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्ahaṃ kraturahaṃ yajñaḥ svadhāhamahamauṣadhammantro'hamahamevājyamahamagnirahaṃ hutamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें