महाभारत 6.31.8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनःभूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्
prakṛtiṃ svāmavaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥbhūtagrāmamimaṃ kṛtsnamavaśaṃ prakṛtervaśāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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