महाभारत 6.34.5
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते
kleśo'dhikatarasteṣāmavyaktāsaktacetasāmavyaktā hi gatirduḥkhaṃ dehavadbhiravāpyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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