महाभारत 6.57.20दमनं चापि दायादं पौरवस्य महात्मनःजघान विपुलाग्रेण नाराचेन परंतपःdamanaṃ cāpi dāyādaṃ pauravasya mahātmanaḥjaghāna vipulāgreṇa nārācena paraṃtapaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें