महाभारत 6.59.22महता मेघघोषेण रथेनादित्यवर्चसाछादयञ्शरवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान्mahatā meghaghoṣeṇa rathenādityavarcasāchādayañśaravarṣeṇa parjanya iva vṛṣṭimānइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें