महाभारत 6.60.17
सोऽपविध्य धनुश्छिन्नं क्रोधेन प्रज्वलन्निवअन्यत्कार्मुकमादत्त सत्वरं वेगवत्तरम्
so'pavidhya dhanuśchinnaṃ krodhena prajvalannivaanyatkārmukamādatta satvaraṃ vegavattaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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