महाभारत 6.76.2
विश्रम्य च यथान्यायं पूजयित्वा परस्परम्संनद्धाः समदृश्यन्त भूयो युद्धचिकीर्षया
viśramya ca yathānyāyaṃ pūjayitvā parasparamsaṃnaddhāḥ samadṛśyanta bhūyo yuddhacikīrṣayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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