महाभारत 6.79.2
न चैव मामकं कंचिद्धृष्टं शंससि संजयनित्यं पाण्डुसुतान्हृष्टानभग्नांश्चैव शंससि
na caiva māmakaṃ kaṃciddhṛṣṭaṃ śaṃsasi saṃjayanityaṃ pāṇḍusutānhṛṣṭānabhagnāṃścaiva śaṃsasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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