महाभारत 6.79.9
आत्मदोषात्समुत्पन्नं शोचितुं नार्हसे नृपन हि रक्षन्ति राजानः सर्वार्थान्नापि जीवितम्
ātmadoṣātsamutpannaṃ śocituṃ nārhase nṛpana hi rakṣanti rājānaḥ sarvārthānnāpi jīvitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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