महाभारत 6.90.38
विमुखांश्चैव तान्दृष्ट्वा द्रौणिचापच्युतैः शरैःअक्रुध्यत महाकायो भैमसेनिर्घटोत्कचः
vimukhāṃścaiva tāndṛṣṭvā drauṇicāpacyutaiḥ śaraiḥakrudhyata mahākāyo bhaimasenirghaṭotkacaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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