महाभारत 6.90.9
क्षिप्रं गच्छत भद्रं वो राजानं परिरक्षतसंशयं परमं प्राप्तं मज्जन्तं व्यसनार्णवे
kṣipraṃ gacchata bhadraṃ vo rājānaṃ parirakṣatasaṃśayaṃ paramaṃ prāptaṃ majjantaṃ vyasanārṇave
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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