महाभारत 7.111.22
तावन्योन्यं शरैर्विद्ध्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैःव्यभ्राजेतां महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ
tāvanyonyaṃ śarairviddhvā svarṇapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥvyabhrājetāṃ mahārāja puṣpitāviva kiṃśukau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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