महाभारत 7.111.8
इषुभिः कार्मुकं चास्य चकर्त पुरुषर्षभःतत्पपात महाराज स्वर्णपृष्ठं महास्वनम्
iṣubhiḥ kārmukaṃ cāsya cakarta puruṣarṣabhaḥtatpapāta mahārāja svarṇapṛṣṭhaṃ mahāsvanam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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