महाभारत 7.128.32
हृष्टो दुर्योधनश्चापि दृढमादाय कार्मुकम्तिष्ठ तिष्ठेति राजानं ब्रुवन्पाण्डवमभ्ययात्
hṛṣṭo duryodhanaścāpi dṛḍhamādāya kārmukamtiṣṭha tiṣṭheti rājānaṃ bruvanpāṇḍavamabhyayāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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