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महाभारत 7.138.25
गजे गजे सप्त कृताः प्रदीपा; रथे रथे चैव दश प्रदीपाःद्वावश्वपृष्ठे परिपार्श्वतोऽन्ये; ध्वजेषु चान्ये जघनेषु चान्ये
gaje gaje sapta kṛtāḥ pradīpā; rathe rathe caiva daśa pradīpāḥdvāvaśvapṛṣṭhe paripārśvato'nye; dhvajeṣu cānye jaghaneṣu cānye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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