महाभारत 7.140.2
अब्रवीत्पाण्डवांश्चैव पाञ्चालांश्च ससोमकान्अभ्यद्रवत गच्छध्वं द्रोणमेव जिघांसया
abravītpāṇḍavāṃścaiva pāñcālāṃśca sasomakānabhyadravata gacchadhvaṃ droṇameva jighāṃsayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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