महाभारत 7.140.39
हार्दिक्यशरसंछिन्नं कवचं तन्महात्मनःव्यशीर्यत रणे राजंस्ताराजालमिवाम्बरात्
hārdikyaśarasaṃchinnaṃ kavacaṃ tanmahātmanaḥvyaśīryata raṇe rājaṃstārājālamivāmbarāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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