महाभारत 7.158.31
स्वभावाद्या च मे प्रीतिः सहदेवे जनार्दनसैव मे द्विगुणा प्रीती राक्षसेन्द्रे घटोत्कचे
svabhāvādyā ca me prītiḥ sahadeve janārdanasaiva me dviguṇā prītī rākṣasendre ghaṭotkace
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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