महाभारत 7.158.7
दैवमेव परं मन्ये यत्कर्णो हस्तसंस्थयान जघान रणे पार्थं कृष्णं वा देवकीसुतम्
daivameva paraṃ manye yatkarṇo hastasaṃsthayāna jaghāna raṇe pārthaṃ kṛṣṇaṃ vā devakīsutam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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