महाभारत 7.166.10
स रथी प्रथमो लोके दृढधन्वा जितक्लमःशीघ्रोऽनिल इवाक्रन्दे चरन्क्रुद्ध इवान्तकः
sa rathī prathamo loke dṛḍhadhanvā jitaklamaḥśīghro'nila ivākrande carankruddha ivāntakaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें