महाभारत 7.168.33
कृते रणे कथं पार्थ ज्वलनार्कविषोपमम्भीमं द्रोणशिरश्छेदे प्रशस्यं न प्रशंससि
kṛte raṇe kathaṃ pārtha jvalanārkaviṣopamambhīmaṃ droṇaśiraśchede praśasyaṃ na praśaṃsasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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