महाभारत 7.37.12
ज्यातलत्रस्वनैरन्ये गर्जन्तोऽर्जुननन्दनम्ब्रुवन्तश्च न नो जीवन्मोक्ष्यसे जीवतामिति
jyātalatrasvanairanye garjanto'rjunanandanambruvantaśca na no jīvanmokṣyase jīvatāmiti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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