महाभारत 7.37.17
चापमण्डलमेवास्य विस्फुरद्दिक्ष्वदृश्यततमो घ्नतः सुदीप्तस्य सवितुर्मण्डलं यथा
cāpamaṇḍalamevāsya visphuraddikṣvadṛśyatatamo ghnataḥ sudīptasya saviturmaṇḍalaṃ yathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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