महाभारत 7.41.7
उग्रधन्वा महेष्वासो दिव्यमस्त्रमुदीरयन्वार्धक्षत्रिरुपासेधत्प्रवणादिव कुञ्जरान्
ugradhanvā maheṣvāso divyamastramudīrayanvārdhakṣatrirupāsedhatpravaṇādiva kuñjarān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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