महाभारत 7.76.4
असन्तस्तु न्यवर्तन्त वेदेभ्य इव नास्तिकाःनरकं भजमानास्ते प्रत्यपद्यन्त किल्बिषम्
asantastu nyavartanta vedebhya iva nāstikāḥnarakaṃ bhajamānāste pratyapadyanta kilbiṣam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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