महाभारत 8.16.20
चर्मवर्माणि संछिन्द्य निर्वापमिव देहिनाम्विषेहुर्नास्य संपर्कं द्वितीयस्य पतत्रिणः
carmavarmāṇi saṃchindya nirvāpamiva dehināmviṣehurnāsya saṃparkaṃ dvitīyasya patatriṇaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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