महाभारत 8.21.42
यक्षरक्षःपिशाचाश्च श्वापदानि च संघशःजग्मुरायोधनं घोरं रुद्रस्यानर्तनोपमम्
yakṣarakṣaḥpiśācāśca śvāpadāni ca saṃghaśaḥjagmurāyodhanaṃ ghoraṃ rudrasyānartanopamam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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