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महाभारत 8.25.5
यत्रास्मि भरतश्रेष्ठ योग्यः कर्मणि कर्हिचित्तत्र सर्वात्मना युक्तो वक्ष्ये कार्यधुरं तव
yatrāsmi bharataśreṣṭha yogyaḥ karmaṇi karhicittatra sarvātmanā yukto vakṣye kāryadhuraṃ tava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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