महाभारत 8.68.41
शरैः संकृत्तवर्माणं वीरं विशसने हतम्गतासुमपि राधेयं नैव लक्ष्मीर्व्यमुञ्चत
śaraiḥ saṃkṛttavarmāṇaṃ vīraṃ viśasane hatamgatāsumapi rādheyaṃ naiva lakṣmīrvyamuñcata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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