महाभारत 8.68.44
ददानीत्येव योऽवोचन्न नास्तीत्यर्थितोऽर्थिभिःसद्भिः सदा सत्पुरुषः स हतो द्वैरथे वृषः
dadānītyeva yo'vocanna nāstītyarthito'rthibhiḥsadbhiḥ sadā satpuruṣaḥ sa hato dvairathe vṛṣaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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