महाभारत 9.2.37शकुनिः सौबलो यत्र कैतव्यश्च महाबलःनिहतः सबलो वीरः किमन्यद्भागधेयतःśakuniḥ saubalo yatra kaitavyaśca mahābalaḥnihataḥ sabalo vīraḥ kimanyadbhāgadheyataḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें