महाभारत 9.2.6
अन्धत्वाद्यदि तेषां तु न मे रूपनिदर्शनम्पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता
andhatvādyadi teṣāṃ tu na me rūpanidarśanamputrasnehakṛtā prītirnityameteṣu dhāritā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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