महाभारत 9.39.5
स निर्विण्णस्ततो राजंस्तपस्तेपे महातपाःततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान्
sa nirviṇṇastato rājaṃstapastepe mahātapāḥtato vai tapasā tena prāpya vedānanuttamān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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