ऋग्वेद 1.105.13
अग्ने॒ तव॒ त्यदु॒क्थ्यं॑ दे॒वेष्व॒स्त्याप्य॑म् ।स न॑: स॒त्तो म॑नु॒ष्वदा दे॒वान् य॑क्षि वि॒दुष्ट॑रो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥
agne tava tyadukthyaṃ deveṣvastyāpyam |sa na: satto manuṣvadā devān yakṣi viduṣṭaro vittaṃ me asya rodasī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें