ऋग्वेद 1.105.9
अ॒मी ये स॒प्त र॒श्मय॒स्तत्रा॑ मे॒ नाभि॒रात॑ता ।त्रि॒तस्तद् वेदा॒प्त्यः स जा॑मि॒त्वाय॑ रेभति वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥
amī ye sapta raśmayastatrā me nābhirātatā |tritastad vedāptyaḥ sa jāmitvāya rebhati vittaṃ me asya rodasī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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