ऋग्वेद 1.109.6
प्र च॑र्ष॒णिभ्य॑: पृतना॒हवे॑षु॒ प्र पृ॑थि॒व्या रि॑रिचाथे दि॒वश्च॑ ।प्र सिन्धु॑भ्य॒: प्र गि॒रिभ्यो॑ महि॒त्वा प्रेन्द्रा॑ग्नी॒ विश्वा॒ भुव॒नात्य॒न्या॥
pra carṣaṇibhya: pṛtanāhaveṣu pra pṛthivyā riricāthe divaśca |pra sindhubhya: pra giribhyo mahitvā prendrāgnī viśvā bhuvanātyanyā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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