ऋग्वेद 1.114.10
आ॒रे ते॑ गो॒घ्नमु॒त पू॑रुष॒घ्नं क्षय॑द्वीर सु॒म्नम॒स्मे ते॑ अस्तु ।मृ॒ळा च॑ नो॒ अधि॑ च ब्रूहि दे॒वाधा॑ च न॒: शर्म॑ यच्छ द्वि॒बर्हा॑:॥
āre te goghnamuta pūruṣaghnaṃ kṣayadvīra sumnamasme te astu |mṛḷā ca no adhi ca brūhi devādhā ca na: śarma yaccha dvibarhā: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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