ऋग्वेद 1.123.9
जा॒न॒त्यह्न॑: प्रथ॒मस्य॒ नाम॑ शु॒क्रा कृ॒ष्णाद॑जनिष्ट श्विती॒ची ।ऋ॒तस्य॒ योषा॒ न मि॑नाति॒ धामाह॑रहर्निष्कृ॒तमा॒चर॑न्ती॥
jānatyahna: prathamasya nāma śukrā kṛṣṇādajaniṣṭa śvitīcī |ṛtasya yoṣā na mināti dhāmāharaharniṣkṛtamācarantī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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