ऋग्वेद 1.141.11
अ॒स्मे र॒यिं न स्वर्थं॒ दमू॑नसं॒ भगं॒ दक्षं॒ न प॑पृचासि धर्ण॒सिम् ।र॒श्मीँरि॑व॒ यो यम॑ति॒ जन्म॑नी उ॒भे दे॒वानां॒ शंस॑मृ॒त आ च॑ सु॒क्रतु॑:॥
asme rayiṃ na svarthaṃ damūnasaṃ bhagaṃ dakṣaṃ na papṛcāsi dharṇasim |raśmīm̐riva yo yamati janmanī ubhe devānāṃ śaṃsamṛta ā ca sukratu: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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