ऋग्वेद 1.164.12
पञ्च॑पादं पि॒तरं॒ द्वाद॑शाकृतिं दि॒व आ॑हु॒: परे॒ अर्धे॑ पुरी॒षिण॑म् ।अथे॒मे अ॒न्य उप॑रे विचक्ष॒णं स॒प्तच॑क्रे॒ षळ॑र आहु॒रर्पि॑तम्॥
pañcapādaṃ pitaraṃ dvādaśākṛtiṃ diva āhu: pare ardhe purīṣiṇam |atheme anya upare vicakṣaṇaṃ saptacakre ṣaḷara āhurarpitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें