ऋग्वेद 1.164.25
जग॑ता॒ सिन्धुं॑ दि॒व्य॑स्तभायद् रथंत॒रे सूर्यं॒ पर्य॑पश्यत् ।गा॒य॒त्रस्य॑ स॒मिध॑स्ति॒स्र आ॑हु॒स्ततो॑ म॒ह्ना प्र रि॑रिचे महि॒त्वा॥
jagatā sindhuṃ divyastabhāyad rathaṃtare sūryaṃ paryapaśyat |gāyatrasya samidhastisra āhustato mahnā pra ririce mahitvā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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